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रक्षाबंधन से एक दिन पहले एक कार्यक्रम के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पहले महिलाओं से राखी बंधवाई और उसके बाद एक बड़ा ऐलान कर दिया। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि वह बिहार में महिला विश्वविद्यालय का निर्माण करवाएंगे, जहां पढ़ने वाली छात्राएं तो महिलाएं होंगी ही, बल्कि वहां पढ़ाने वाले सभी शिक्षक और काम करने वाले अन्य कर्मचारी भी महिलाएं होंगी।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयान के बाद लोग इस फैसले को अपने-अपने नजरिए से देखने लगे। कोई इसे महिला शिक्षा के क्षेत्र में मास्टर स्ट्रोक बता रहा था तो कोई इसे बेकार का फैसला बता रहा था। बीजेपी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी रक्षाबंधन के अवसर पर इसका जमकर प्रचार-प्रसार किया गया। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह विश्वविद्यालय कहां बनेगा और इसकी रूपरेखा क्या होगी।

स्कूल के दिनों में पढ़ाई के दौरान हमने देखा है कि बिहार में कई सरकारी और निजी स्कूल हैं, जहां सिर्फ लड़कियों को पढ़ने का अधिकार दिया जाता है। मैट्रिक और इंटर की पढ़ाई के बाद छात्राओं के लिए महिला या गर्ल्स कॉलेज भी बिहार में संचालित किए जा रहे हैं। लेकिन महिला विश्वविद्यालय का कॉन्सेप्ट पहली बार सुनने में आया, खासकर उस बिहार में जहां आज भी कई गर्ल्स स्कूल और कॉलेजों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

हमें लगा कि यह पता करना चाहिए कि क्या बिहार में कभी महिला विश्वविद्यालय खुला था? देश और दूसरे राज्यों में महिला विश्वविद्यालयों की क्या स्थिति है? क्या जहां-जहां महिला विश्वविद्यालय खोले गए, वहां सफलता मिली या असफलता हाथ लगी? इसके बाद जो जानकारी निकलकर सामने आई, वह आपको भी हैरान कर सकती है।

पहले बिहार की बात कर लेते हैं। 8 फरवरी 2021 को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में शिक्षा विभाग की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार बिहार में एक महिला विश्वविद्यालय और 55 गर्ल्स कॉलेज संचालित किए जा रहे थे। वहीं, देश स्तर की बात करें तो पूरे देश में 12 महिला विश्वविद्यालय और 1,029 गर्ल्स कॉलेज संचालित किए जा रहे थे।

बिहार में एक महिला विश्वविद्यालय और हमें पता ही नहीं है! हमें लगा कि शायद हमें जानकारी का अभाव है। इसी वजह से हमने वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र से संपर्क किया और उनसे पूछा कि क्या उन्हें पता है कि बिहार में पहले से एक महिला विश्वविद्यालय है? उन्होंने साफ तौर पर इससे इनकार कर दिया।

मुझे लगा कि शायद उनके पास भी इस संबंध में जानकारी का अभाव है। इसके बाद हमने वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकांत सजल से संपर्क किया। उनका जवाब इससे भी ज्यादा हैरान करने वाला था। लक्ष्मीकांत सजल के अनुसार, बिहार में एक महिला विश्वविद्यालय होने की बात तो गलत है ही, 55 महिला कॉलेजों का जो आंकड़ा दिया गया है, वह भी सरासर गलत है।

जब हमने दोनों वरिष्ठ पत्रकारों से पूछा कि क्या वर्तमान समय में महिला कॉलेज या महिला विश्वविद्यालय का कॉन्सेप्ट प्रासंगिक है? इसकी सफलता की कितनी संभावना है और असफलता की कितनी?

सबसे पहले वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं—
“देखिए, महिला कॉलेज और महिला विश्वविद्यालय का कॉन्सेप्ट वर्तमान समय में ऐसे देश में प्रासंगिक है, जहां आज भी पर्दा सिस्टम लागू है यार जहां लड़कियों को आज भी बराबरी का अधिकार नहीं दिया जा रहा है। जब देश में गर्ल्स स्कूल और कॉलेज के कॉन्सेप्ट को बढ़ावा दिया गया था, उस समय लड़कियों के परिवार वाले उन्हें स्कूल और कॉलेज भेजने के लिए तैयार नहीं हुआ करते थे। यही कारण था कि उन्हें स्कूल तक पहुंचाने के लिए परिवारों को भरोसा दिलाया जाता था कि जिस स्कूल या कॉलेज में उनकी बेटियां जा रही हैं, वहां सिर्फ लड़कियां ही पढ़ती हैं।”

लेकिन अगर वर्तमान समय की बात करें तो स्थिति काफी बदल चुकी है। चाहे सरकारी स्कूल की बात करें या निजी स्कूल की, अब ऐसी स्थिति बहुत कम देखने को मिलती है। आखिरकार जिन लड़कियों को मैट्रिक तक और फिर 11वीं-12वीं में लड़कों के साथ पढ़ने में कोई परेशानी नहीं हो रही है, उनके लिए अलग से विशेष विश्वविद्यालय की क्या जरूरत है?

पुष्यमित्र के अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में शायद ही कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के इस महिला विश्वविद्यालय के विचार का समर्थन करेगा।

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकांत सजल का कहना है कि मुख्यमंत्री ने अभी सिर्फ घोषणा की है। विश्वविद्यालय की वास्तविक रूपरेखा क्या होगी, यह सामने आने के बाद ही तय किया जा सकता है कि यह प्रयोग कितना सफल होगा या असफल।

हालांकि, लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं कि बिहार में कभी कोई स्वतंत्र महिला विश्वविद्यालय खुला ही नहीं। अगर सरकार वर्तमान विश्वविद्यालयों की तरह ही एक सामान्य महिला विश्वविद्यालय बनाने जा रही है, तो इससे बहुत ज्यादा फायदा होने की संभावना नहीं है।
लेकिन अगर महिलाओं के लिए रिसर्च या टेक्निकल यूनिवर्सिटी बनाई जाती है तो यह न सिर्फ सफल हो सकती है, बल्कि बिहार की महिला शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम भी साबित हो सकती है।

आसान भाषा में कहा जाए तो बीए, बीकॉम, एमए या एमकॉम जैसी सामान्य पढ़ाई के लिए महिलाओं को अलग से विश्वविद्यालय की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनके पास पहले से ही दूसरे विश्वविद्यालयों में पढ़ने के विकल्प मौजूद हैं।

लेकिन अगर एक खास कॉन्सेप्ट के तहत रिसर्च, टेक्नोलॉजी, मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य आधुनिक क्षेत्रों पर केंद्रित महिला विश्वविद्यालय बनाया जाता है, तो यह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल हो सकती है।

बताते चलें कि भारत में पहला महिला विश्वविद्यालय 1916 में महाराष्ट्र के पुणे में महर्षि धोंडो केशव कर्वे ने स्थापित किया था। इसका प्रारंभिक नाम The Indian Women’s University था, जिसे बाद में SNDT Women’s University नाम मिला। विश्वविद्यालय स्वयं इसे भारत और दक्षिण एशिया का पहला महिला विश्वविद्यालय बताता है।

इसके बाद भारत के कई राज्यों में महिला विश्वविद्यालय स्थापित किए गए। प्रमुख राज्यों में आंध्र प्रदेश, असम, हरियाणा, कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और उत्तराखंड शामिल हैं।

वहीं, SNDT Women’s University की संबद्धता महाराष्ट्र के अलावा गुजरात, दमन, असम, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक रही है।

अब सवाल यह है कि बिहार में बनने वाला प्रस्तावित महिला विश्वविद्यालय भी सामान्य डिग्री देने वाला संस्थान होगा या फिर रिसर्च, टेक्नोलॉजी और आधुनिक शिक्षा पर केंद्रित एक ऐसा संस्थान बनेगा, जो देश के दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण बन सके?
इसका जवाब विश्वविद्यालय की रूपरेखा सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।

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