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| पटना मेट्रो ट्रेन का कोच जिसे करोड़ों रुपए खर्च कर किराए पर लिया गया है |
पटना 12 जुलाई 2026 : पटना मेट्रो अपनी ट्रेनें छोड़ किराये के कोचों पर क्यों निर्भर? करोड़ों के खर्च ने खड़े किए कई बड़े सवाल
पटना: राजधानी पटना में मेट्रो रेल सेवा की शुरुआत को आधुनिक बिहार की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। धीरे-धीरे मेट्रो का नेटवर्क भी आगे बढ़ रहा है और यात्रियों की संख्या में भी इजाफा होने की उम्मीद है। लेकिन इस परियोजना से जुड़ा एक ऐसा तथ्य सामने आया है, जिसने वित्तीय प्रबंधन और सरकारी रणनीति को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, पटना मेट्रो जिन ट्रेनों का संचालन कर रही है, वे उसकी अपनी नहीं बल्कि पुणे मेट्रो से किराये पर ली गई हैं।
वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र अपने एक आलेख में लिखते हैं कि, पटना मेट्रो ने 15 जुलाई 2025 को पुणे मेट्रो से पहली बार तीन कोच वाली एक ट्रेन किराये पर ली थी। तीन वर्ष की अवधि के लिए इस ट्रेन का किराया लगभग 21.15 करोड़ रुपये तय किया गया। अब मेट्रो कॉरिडोर के विस्तार के साथ पटना मेट्रो ने इसी मॉडल पर पुणे मेट्रो से तीन और ट्रेन सेट किराये पर लेने का फैसला किया है। इन तीनों ट्रेन सेट के लिए करीब 63.45 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे और इनके दिसंबर तक पटना पहुंचने की संभावना है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है कि जब एक तीन कोच वाली नई मेट्रो ट्रेन की अनुमानित कीमत करीब 30 करोड़ रुपये बताई जा रही है, तो फिर सरकार खरीदने की बजाय किराये पर इतना बड़ा खर्च क्यों कर रही है? पहली नजर में यह फैसला आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं दिखाई देता।
हालांकि इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण भी सामने आता है। वर्ष 2022 में पटना मेट्रो के लिए 27 ट्रेन सेट तैयार करने का ठेका टीटागढ़ रेल सिस्टम लिमिटेड को दिया गया था। लेकिन अब तक कंपनी ने ट्रेन सेट की आपूर्ति शुरू नहीं की है। आधिकारिक तौर पर देरी की वजह सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में मेट्रो सेवा शुरू करने और विस्तार के लिए सरकार के सामने फिलहाल किराये पर ट्रेन लेने का विकल्प ही उपलब्ध बताया जा रहा है।
हालांकि मामला केवल यहीं तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि पुणे मेट्रो के पास पहले से पर्याप्त ट्रेन सेट उपलब्ध हैं, जिनमें से सभी का नियमित उपयोग भी नहीं हो रहा है। ऐसे में क्या पटना मेट्रो का किराये का फैसला केवल अस्थायी व्यवस्था है या इसके पीछे कोई प्रशासनिक अथवा नीतिगत कारण भी हैं? इस पर सरकार की ओर से अब तक विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अपने ट्रेन सेट जल्द उपलब्ध हो जाते हैं तो लंबे समय में किराये पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी और सरकारी खर्च भी कम होगा। दूसरी ओर, विपक्ष और कई जानकार इस पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि ट्रेनों की खरीद में देरी क्यों हुई, किराये का मॉडल कितने समय तक जारी रहेगा और इससे राज्य के खजाने पर कुल कितना अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
पटना मेट्रो बिहार की सबसे महत्वाकांक्षी शहरी परिवहन परियोजनाओं में से एक है। ऐसे में लोगों की अपेक्षा है कि सरकार इस मुद्दे पर सभी तथ्यों को सार्वजनिक करे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि करोड़ों रुपये खर्च कर किराये पर ट्रेनें लेना केवल एक अस्थायी मजबूरी है या इसके पीछे कोई और वजह भी है।
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