इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेना मात्र अपने आप में SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता। यह भी साबित करना जरूरी है कि जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने की मंशा से किया गया था।
जस्टिस संतोष राय की पीठ ने वेगराज सिंह और दौलत सिंह की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए बरेली की अदालत द्वारा 21 मार्च 2025 को जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। दोनों को मुकदमे में शामिल होने के लिए BNSS की धारा 358 के तहत समन भेजा गया था।
मामला बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र का है। यहां दुष्कर्म और धमकी के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई थी। जांच के बाद मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया, जबकि उसके पिता वेगराज सिंह और भाई दौलत सिंह को जांच के दौरान आरोपों से बाहर रखा गया था।
बाद में सुनवाई के दौरान पीड़िता ने आरोप लगाया कि दोनों ने उसके लिए ‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल किया। इसी बयान के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने उन्हें समन जारी किया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि केवल जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने के इरादे से ऐसा किया।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हरदीप सिंह बनाम पंजाब सरकार फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को चल रहे मुकदमे में आरोपी के रूप में शामिल करने की शक्ति असाधारण है और इसका इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए। इसके लिए केवल प्रथम दृष्टया आधार नहीं, बल्कि मजबूत और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।
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