पटना। बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। शराबबंदी को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससीआर) की रिपोर्ट और उसमें की गई सिफारिशों के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच बयानबाजी शुरू हो गई है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने बिहार में शराबबंदी की समीक्षा और गुजरात मॉडल लागू करने की वकालत की है। उनके बयान पर बिहार भाजपा अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
मांझी ने कहा कि बिहार में शराबबंदी लागू होने के बावजूद शराब की बिक्री और सेवन की शिकायतें सामने आती रहती हैं। ऐसे में गुजरात मॉडल को बिहार में लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने शराबबंदी के सामाजिक प्रभाव और इसके क्रियान्वयन की समीक्षा की जरूरत बताई।
मांझी के बयान पर भाजपा के वरिष्ठ नेता दिलीप जायसवाल ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर शराबबंदी हटाकर राजस्व बढ़ाना ही उद्देश्य है, तो क्या सरकार राजस्व के लिए शराब की दुकानों का कोटा खोल दे? उन्होंने शराबबंदी को सामाजिक सुधार से जोड़ते हुए इसके उद्देश्य और प्रभाव पर चर्चा की जरूरत बताई।
सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने
शराबबंदी के समर्थन में सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि इससे महिलाओं और गरीब परिवारों पर सकारात्मक असर पड़ा है। उनका दावा है कि शराबबंदी के कारण घरेलू हिंसा और परिवार की आर्थिक बर्बादी में कमी आई है।
वहीं विपक्ष शराबबंदी के मौजूदा स्वरूप पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष का कहना है कि कानून लागू होने के बावजूद राज्य में अवैध शराब का कारोबार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसके कारण सरकार को राजस्व का नुकसान होने के साथ-साथ अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलने की बात भी कही जा रही है।
रिपोर्ट में अवैध कारोबार बढ़ने का दावा
अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, एनसीएससीआर की रिपोर्ट में शराबबंदी के बाद अवैध व्यापार बढ़ने का दावा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब की बिक्री पर प्रतिबंध के बावजूद अवैध कारोबार की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसके अलावा पुलिस और प्रशासनिक तंत्र पर भी अतिरिक्त दबाव बढ़ने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि शराबबंदी के बाद राज्य को शराब से मिलने वाले राजस्व का नुकसान हुआ है। दूसरी ओर, सरकार लगातार शराबबंदी को सामाजिक सुधार और जनहित से जुड़ा कदम बताती रही है।
सरकार के सामने चुनौती
बिहार में शराबबंदी को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल इसके प्रभावी क्रियान्वयन का है। एक तरफ सरकार इसे सामाजिक बदलाव की महत्वपूर्ण पहल बताती है, तो दूसरी तरफ अवैध शराब और तस्करी को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
ऐसे में जीतन राम मांझी के गुजरात मॉडल वाले सुझाव और दिलीप जायसवाल की प्रतिक्रिया ने बिहार की राजनीति में शराबबंदी के मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन सकता है।
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