पटना। रक्षाबंधन को आज भाई-बहन के प्रेम और विश्वास से जुड़े पर्व के रूप में जाना जाता है। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है। लेकिन सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि रक्षाबंधन का पूरा विधान मनुस्मृति में लिखा है। शास्त्रों को देखने पर तस्वीर थोड़ी अलग सामने आती है।
मनुस्मृति में क्या लिखा है?
मनुस्मृति के चौथे अध्याय में श्रावण पूर्णिमा का उल्लेख मिलता है। अध्याय 4, श्लोक 95 में उपाकर्म का विधान बताया गया है। इसमें श्रावण या प्रोष्ठपद की पूर्णिमा पर विधिपूर्वक उपाकर्म करने के बाद वेदों का अध्ययन करने की बात कही गई है।
श्लोक है—
“श्रावण्यां प्रोष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि।
युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान्॥”
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस श्लोक में भाई द्वारा बहन या बहन द्वारा भाई को राखी बांधने की आज की परंपरा का उल्लेख नहीं है।
इसलिए यह कहना कि “मनुस्मृति में रक्षाबंधन का वर्तमान स्वरूप लिखा है”, शास्त्रीय दृष्टि से सही नहीं होगा।
रक्षा-सूत्र की परंपरा का क्या आधार है?
प्राचीन भारतीय धार्मिक परंपरा में रक्षा-सूत्र बांधने की अवधारणा जरूर मिलती है। श्रावण पूर्णिमा से जुड़े बाद के ग्रंथीय संदर्भों में रक्षा बांधने की विधि का वर्णन मिलता है। इनमें राजा की कलाई पर रक्षा बांधने की परंपरा का उल्लेख किया गया है।
इससे पता चलता है कि “रक्षा” बांधने की धार्मिक परंपरा और आज की “राखी” एक ही चीज को बिल्कुल उसी रूप में नहीं दर्शातीं। समय के साथ धार्मिक अनुष्ठान का सामाजिक स्वरूप बदला और रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते से विशेष रूप से जुड़ गया।
“येन बद्धो बलि राजा...” मंत्र कहां से आया?
राखी बांधते समय अक्सर यह मंत्र बोला जाता है—
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
इस मंत्र को भी मनुस्मृति का मंत्र बताना सही नहीं है। इसे रक्षा-सूत्र की धार्मिक परंपरा से जुड़े अन्य ग्रंथीय स्रोतों में पाया जाता है।
यहां राजा बलि का उदाहरण देकर रक्षा-सूत्र की सुरक्षा और स्थिरता की कामना की जाती है।
क्या प्राचीन समय में राखी सिर्फ भाई को बांधी जाती थी?
ऐसा कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा। पुराने धार्मिक संदर्भों में रक्षा-सूत्र का प्रयोग केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं दिखाई देता। इसका संबंध रक्षा, मंगल और धार्मिक अनुष्ठान से था।
बाद के सामाजिक विकास के साथ श्रावण पूर्णिमा का यह पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में मनाया गया। वर्तमान भारत में इसका सबसे लोकप्रिय स्वरूप भाई-बहन के स्नेह और सुरक्षा के संकल्प से जुड़ा है।
तो सच क्या है?
पूरे विषय को सरल शब्दों में समझें तो—
मनुस्मृति: श्रावण पूर्णिमा पर उपाकर्म का उल्लेख करती है।
रक्षा-सूत्र की परंपरा: अन्य धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में मिलती है।
आज की राखी: मुख्य रूप से भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के संकल्प का सामाजिक पर्व है।
इसलिए रक्षाबंधन को सीधे-सीधे “मनुस्मृति में वर्णित पर्व” कहना उचित नहीं है। अधिक सटीक बात यह है कि श्रावण पूर्णिमा प्राचीन धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण रही है और रक्षा-सूत्र की परंपरा समय के साथ विकसित होकर आज के रक्षाबंधन के रूप में व्यापक रूप से प्रचलित हुई।
यही अंतर सोशल मीडिया पर वायरल दावों और शास्त्रीय संदर्भों के बीच समझना जरूरी है।
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