नई दिल्ली/पटना। बिहार की राजनीति में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार की सार्वजनिक छवि एक सादगी पसंद और अनुशासित नेता की रही है। उनके राजनीतिक जीवन से जुड़े कई किस्से समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प प्रसंग उनके रेल मंत्री बनने के शुरुआती दौर का है। यह कहानी उनके करीबी मित्र उदयकांत की किताब ‘नीतीश अंतरंग, दोस्तों की नजर से’ में दर्ज है। यह प्रसंग बताता है कि रेलवे के विशेष सैलून में यात्रा के दौरान नीतीश कुमार ने किस तरह अधिकारियों के बीच भोजन को लेकर बनी एक खास मानसिकता को अपने सहज अंदाज में बदल दिया था।
कहानी उस समय की है, जब नीतीश कुमार पहली बार रेल मंत्री बने थे। रेलवे में वरिष्ठ अधिकारियों की यात्रा के लिए लंबे समय से विशेष सैलून की व्यवस्था रही है। इन सैलून में सफर के दौरान काम करने के लिए अलग जगह, सोने-बैठने की सुविधा, स्नानघर और रसोई जैसी व्यवस्थाएं होती थीं। यानी अधिकारी चलते-फिरते एक छोटे से घर में रहकर भी अपना काम जारी रख सकते थे।
रेल मंत्री के लिए इस्तेमाल होने वाला विशेष सैलून इससे भी अधिक सुविधाओं से लैस होता था। इसे एमआर स्पेशल कहा जाता था। इसमें बेहतर साज-सज्जा के साथ कर्मचारियों और रसोइयों के लिए भी व्यवस्था रहती थी। मंत्री की जरूरत और इच्छा के अनुसार इस विशेष सैलून को किसी ट्रेन के साथ जोड़ा जा सकता था।
नीतीश कुमार के पहली बार एमआर स्पेशल से यात्रा करने के दौरान रेलवे के खान-पान विभाग के अधिकारियों के लिए भी यह एक खास मौका था। नए रेल मंत्री के स्वागत में भोजन की विशेष तैयारी की गई। उस दौर की व्यवस्था के मुताबिक मंत्री के लिए तैयार भोजन को परोसे जाने से पहले कई वरिष्ठ अधिकारी भी चखते और उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करते थे।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में असली दिलचस्पी खाने से ज्यादा इस बात को लेकर थी कि रेल मंत्री के साथ भोजन की मेज पर बैठने का मौका किसे मिलेगा। अधिकारियों के लिए मंत्री के साथ भोजन करना केवल भोजन तक सीमित नहीं माना जाता था। यह मंत्री से सीधे संपर्क बनाने और अपनी नजदीकी बढ़ाने का अवसर भी समझा जाता था।
बताया जाता है कि उस समय कई अधिकारी इस उम्मीद में आसपास मौजूद थे कि शायद मंत्री उन्हें साथ खाने के लिए बुला लें। लेकिन नीतीश कुमार इन गतिविधियों से लगभग अनजान अपने काम में व्यस्त थे। वह सैलून में बैठकर फाइलें देख रहे थे। दूसरी तरफ भोजन तैयार था और खाने का समय निकलता जा रहा था।
जब खाने में देरी होने लगी तो नीतीश कुमार को इसका अहसास हुआ। उन्होंने घड़ी देखी और अधिकारियों से कहा कि वे लोग खाना खाकर जल्दी वापस आ जाएं। लेकिन उनकी बात सुनकर भी अधिकारी तुरंत भोजन के लिए जाने को तैयार नहीं हुए। हर कोई दूसरे का इंतजार करता रहा।
स्थिति ऐसी बन गई कि कोई भी अधिकारी पहल नहीं करना चाहता था। तभी किसी अधिकारी की तरफ से सुझाव आया कि पहले काम पूरा कर लिया जाए और उसके बाद भोजन किया जाए। नीतीश कुमार ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने जरूरी फाइलों पर काम कर रहे दो अधिकारियों को अपने पास रहने दिया और बाकी अधिकारियों से भोजन करने के लिए जाने को कहा।
इसके बाद खाने की मेज पर सिर्फ चार लोग रह गए।
अब इस कहानी का सबसे अहम हिस्सा सामने आता है। जिन अधिकारियों को उम्मीद रही होगी कि रेल मंत्री के साथ बैठकर उन्हें रेलवे की तरफ से तैयार किया गया विशेष भोजन मिलेगा, उनके सामने कुछ बिल्कुल अलग था। नीतीश कुमार का खाना घर से आया था।
मेज पर घर की बनी भुजिया और अचार के साथ पराठे रखे गए। यानी रेलवे के विशेष सैलून में मौजूद तमाम सुविधाओं और खान-पान विभाग की तैयारियों के बावजूद नीतीश कुमार अपने घर से आए साधारण भोजन को ही प्राथमिकता दे रहे थे।
किताब में दर्ज विवरण के मुताबिक, नीतीश कुमार को अपने रसोई प्रभारी शम्भू की इस व्यवस्था पर संतोष हुआ। वहीं उनके साथ बैठे अधिकारियों को भी उसी घर के खाने से संतोष करना पड़ा। उनके लिए कोई अलग विशेष पकवान नहीं आया।
इस छोटे से प्रसंग का असर आगे की रेल यात्राओं में भी दिखाई देने की बात किताब में कही गई है। बाद की यात्राओं में अधिकारियों के बीच मंत्री के साथ भोजन करने को लेकर पहले जैसी उत्सुकता नहीं दिखाई देती थी। धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो गया कि नीतीश कुमार के साथ भोजन करना किसी विशेष सरकारी दावत या औपचारिक अवसर की तरह नहीं था।
बताया गया है कि आगे की यात्राओं में उनके साथ भोजन करने वालों में उनके पुराने परिचित और करीबी लोग शामिल रहे। किताब में आदित्य, आरसीपी और चंचल कुमार जैसे नामों का उल्लेख किया गया है।
इस पूरे प्रसंग को अगर सिर्फ घर के खाने और रेल यात्रा की कहानी माना जाए तो शायद इसकी अहमियत कम लगे। लेकिन इसके पीछे उस दौर की सरकारी कार्यसंस्कृति की एक तस्वीर भी दिखाई देती है। बड़े अधिकारी नए मंत्री के साथ संबंध बनाने और अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश करते थे। मंत्री के साथ भोजन करना भी इसी संपर्क का एक माध्यम माना जाता था।
नीतीश कुमार ने इस माहौल का सामना किसी कठोर आदेश या सार्वजनिक फटकार से नहीं किया। उन्होंने बस अपने सामान्य तरीके से खाना खाया और फिर अपने काम में लग गए। उनके लिए भोजन को लेकर औपचारिकता से ज्यादा जरूरी काम दिखाई देता था।
यह कहानी नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन के उस दौर की है, जब वे केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे और रेलवे जैसे बड़े मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। आज जब उनके राजनीतिक सफर को पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो ऐसे निजी और अनौपचारिक प्रसंग उनके व्यक्तित्व के उन पहलुओं को सामने लाते हैं, जो राजनीतिक मंचों पर दिखाई नहीं देते।
उदयकांत की किताब में दर्ज यह किस्सा यह भी बताता है कि किसी नेता की कार्यशैली केवल उसके भाषणों और फैसलों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के छोटे व्यवहार से भी समझी जा सकती है। एक तरफ रेल मंत्री के लिए विशेष सैलून, रेलवे के अधिकारियों की भीड़ और खास भोजन की तैयारियां थीं, तो दूसरी तरफ मंत्री की मेज पर घर से आया साधारण पराठा, भुजिया और अचार था।
यही विरोधाभास इस कहानी को दिलचस्प बनाता है। चलती ट्रेन में बने विशेष सैलून में जहां सरकारी वैभव की पूरी व्यवस्था मौजूद थी, वहीं रेल मंत्री नीतीश कुमार के लिए उस समय सबसे खास चीज थी—घर से आया खाना।
यह प्रसंग उनके करीबी मित्र द्वारा लिखी पुस्तक में दर्ज एक संस्मरण है, इसलिए इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए। यह कोई सरकारी रिपोर्ट या आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के व्यक्तित्व से जुड़ा एक संस्मरणात्मक विवरण है।
फिर भी यह सवाल छोड़ जाता है कि सत्ता और सुविधा के बीच किसी नेता की वास्तविक पसंद क्या होती है? इस कहानी में जवाब बहुत साधारण है—एक प्लेट घर के पराठे, भुजिया और अचार।
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