अजय आहूजा की पत्नी अलका ने कारगिल युद्ध के अंतिम मिशन को याद करते हुए बताया कि अजय ने उन्हें अपने पेशे के जोखिमों के लिए किस तरह तैयार किया था और जिस दिन उन्हें पति की शहादत की खबर मिली, उस दिन क्या हुआ था।
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने के 27 साल से अधिक समय बाद उनकी कहानी अब ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में दिखाई जा रही है, जो नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है। इस सीरीज में अभिनेता सिद्धार्थ ने भारतीय वायुसेना के इस जांबाज अधिकारी का किरदार निभाया है।
अजय आहूजा ने 27 मई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान अपने साथी पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता को खोजने के लिए पीछे रुकने का फैसला किया था। नचिकेता बालटिक सेक्टर में एक मिशन के दौरान अपने MiG-27 विमान से बाहर निकलने के लिए मजबूर हुए थे। अजय आहूजा का MiG-21 बाद में जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल की चपेट में आ गया। उन्होंने विमान से बाहर निकलकर अपनी जान बचाई, लेकिन नियंत्रण रेखा के दूसरी तरफ जा गिरे और उन्हें पकड़ लिया गया। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
पुराने इंटरव्यू में उनकी पत्नी अलका आहूजा ने युद्ध के नायक के पीछे छिपे एक पति और पिता को याद किया था। उन्होंने बताया था कि अजय की वायुसेना के प्रति प्रतिबद्धता ने उनकी शादी और पारिवारिक जीवन को किस तरह प्रभावित किया।
‘वायुसेना मेरी पहली पत्नी है’
अजय और अलका की शादी को उनकी शहादत से पहले करीब 10 साल हो चुके थे। शादी के तुरंत बाद अजय ने अलका से कहा था कि वह उनकी “दूसरी पत्नी” हैं। यह सुनकर अलका पहले हैरान रह गईं। बाद में अजय ने समझाया कि उनकी पहली पत्नी भारतीय वायुसेना है।
एक पुराने इंटरव्यू में अलका ने कहा था कि शादी के तुरंत बाद फ्लाइट लेफ्टिनेंट अजय आहूजा ने उन्हें बताया कि वह उनकी दूसरी पत्नी हैं। जब उन्होंने समझाया कि उनकी पहली पत्नी भारतीय वायुसेना है, तो अलका को गर्व महसूस हुआ। उन्हें लगा कि उन्हें सिर्फ एक प्यार करने वाला पति ही नहीं मिला, बल्कि ऐसा इंसान मिला है जिसे देश से बेहद प्यार है।
समय के साथ अलका ने देखा कि अजय उड़ान और अपने काम के प्रति कितने समर्पित थे। उनकी ड्यूटी में रात की उड़ान, लंबे समय तक काम और परिवार से दूर पोस्टिंग शामिल होती थी। हालांकि जब भी वह परिवार के साथ होते, उस समय को पूरी तरह परिवार के लिए देते थे।
अलका के मुताबिक, अजय की प्राथमिकता हमेशा वायुसेना और देश थी और उसके बाद परिवार।
अजय जानते थे कि नौकरी जोखिम भरी है
अजय जानते थे कि वायुसेना की नौकरी में जोखिम है। इसलिए उन्होंने अलका को भी जीवन की मुश्किल परिस्थितियों के लिए मजबूत बनाने की कोशिश की।
अलका ने बताया कि शादी से पहले वह बहुत सरल जीवन जीती थीं, लेकिन अजय चाहते थे कि वह आत्मनिर्भर और मजबूत बनें।
उन्होंने अलका को पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। अजय चाहते थे कि वह B.Sc. और B.Ed. की पढ़ाई पूरी करें और अपने पैरों पर खड़ी हों। उन्होंने अलका को शिक्षण कार्य करने के लिए भी प्रोत्साहित किया।
वायुसेना के स्टेशनों पर रहने के दौरान परिवार और रिश्तेदारों से दूर रहना पड़ता था। ऐसे में अजय चाहते थे कि अलका आत्मविश्वास के साथ परिवार की जिम्मेदारियां संभाल सकें।
अजय की शहादत के बाद यही आत्मनिर्भरता अलका के लिए बेहद जरूरी साबित हुई। उन्हें अपने पांच साल के बेटे की परवरिश, उसकी पढ़ाई और अपना करियर—सब कुछ अकेले संभालना पड़ा।
‘मुझे लगा था 22 मई तक वापस आ जाएंगे’
अजय आहूजा 18 मई 1999 को श्रीनगर के लिए रवाना हुए थे। उनका जन्मदिन चार दिन बाद था और अलका को उम्मीद थी कि वह जल्द लौट आएंगे।
अलका ने बताया कि उन्हें लगा था कि अजय कुछ दिनों के लिए गए हैं और 22 मई तक वापस आ जाएंगे।
अपने जन्मदिन पर अजय ने अलका को फोन किया और बताया कि वह अभी तुरंत वापस नहीं लौट पाएंगे। उन्होंने अलका और उनके पांच वर्षीय बेटे अंकुर को श्रीनगर आने के लिए कहा। अंकुर अपने पिता को ‘दादा’ कहकर बुलाता था और उनसे मिलने के लिए बेहद उत्साहित था।
लेकिन परिवार श्रीनगर नहीं जा सका। 23 मई से श्रीनगर के लिए नागरिक उड़ानें रद्द कर दी गई थीं। अलका को शुरुआत में इसका कारण समझ नहीं आया।
उन्होंने बताया कि उन्हें लगा कि उड़ानें रद्द होना थोड़ा अजीब है, लेकिन उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि वहां हालात इतने गंभीर हैं।
26 मई को हवाई हमले शुरू हो गए।
अगले दिन, करीब शाम 4:30 बजे स्टेशन कमांडर वर्दी में अलका के घर पहुंचे। अजय पहले ही उन्हें बता चुके थे कि अगर सब कुछ ठीक हो तो कोई अधिकारी वर्दी में घर नहीं आएगा।
स्टेशन कमांडर ने बताया कि अजय ने विमान से बाहर निकलकर अपनी जान बचाई है, लेकिन वह लापता हैं।
शुरुआत में अलका को उम्मीद थी। उन्हें केवल इतना पता था कि अजय विमान से बाहर निकले हैं और उन्हें यह नहीं मालूम था कि वह कहां गिरे हैं।
लेकिन समय बीतता गया। अंधेरा होने लगा तो अलका को चिंता होने लगी कि यह पहाड़ी इलाका है और अजय को वहां से कैसे निकाला जाएगा।
करीब शाम 7:30 बजे उन्हें बताया गया कि दो पायलटों ने विमान से बाहर निकलकर अपनी जान बचाई थी। उनमें से एक जीवित है और दूसरा नहीं रहा।
करीब 8:30 बजे अलका को पता चला कि जिस अधिकारी की मौत हुई है, वह अजय आहूजा थे।
अलका ने कहा कि उस घटना के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई।
नचिकेता को खोजने के लिए वापस क्यों गए अजय?
अजय आहूजा अपने साथी पायलट के. नचिकेता को खोजने और बचाव अभियान को दिशा देने के लिए पीछे रुके थे। उस समय दुश्मन की मिसाइलों का खतरा मौजूद था।
अलका के मुताबिक, अजय का स्वभाव ही ऐसा था कि वह किसी की मदद करने से कभी पीछे नहीं हटते थे। जब उन्हें पता चला कि नचिकेता को उनकी मदद की जरूरत है, तो वह वहां से हटने वाले नहीं थे।
बाद में अलका को मिशन के बारे में और जानकारी मिली। अजय ने विमान का पता लगा लिया था और बचाव हेलीकॉप्टर को रास्ता दिखा रहे थे। इसी दौरान उनका विमान दुश्मन की मिसाइल की चपेट में आ गया।
अलका के मुताबिक, अजय को पता था कि हेलीकॉप्टर आ रहा है और मदद पहुंच सकती है। इसके बावजूद उन्होंने उस जगह को नहीं छोड़ा।
उन्होंने कहा कि अजय कभी यह सोचकर काम नहीं करते थे कि उनके साथ आगे क्या होगा। वह परिणामों के बारे में नहीं सोचते थे, बल्कि अपना कर्तव्य निभाते थे।
‘मुझे आज भी वही मुस्कुराता चेहरा दिखाई देता है’
जब अजय का पार्थिव शरीर भारत लाया गया, तब अलका ने उसे देखने का फैसला नहीं किया। उन्हें सलाह दी गई थी कि अजय की यादों को उनके मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ ही संजोकर रखें।
अलका ने बताया कि सभी ने उन्हें सलाह दी थी कि वह अजय के मुस्कुराते चेहरे को याद रखें और पार्थिव शरीर को न देखें। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने सही फैसला किया।
दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अलका के मन में अजय की वही मुस्कुराती हुई छवि है।
उन्होंने कहा कि कभी-कभी उन्हें आज भी लगता है कि अजय एक दिन उसी मुस्कुराते चेहरे के साथ उनके सामने खड़े होंगे।
अलका ने बेटे की अकेले परवरिश की
अजय और अलका का बेटा अंकुर उस समय सिर्फ पांच साल का था। पिता की मौत को वह शुरुआत में समझ नहीं पाया था और अजय के बारे में बहुत कम बात करता था।
एक दिन अलका को उसके सवाल ने अंदर तक झकझोर दिया। उसने पूछा—“पापा कभी वापस नहीं आएंगे?”
इसके बाद अंकुर ने अपने पिता के बारे में बात करना लगभग बंद कर दिया।
अलका को एहसास हुआ कि उन्हें अपने बेटे के लिए मजबूत बनना होगा। उन्होंने खुद को संभाला और बेटे की पढ़ाई और भविष्य को प्राथमिकता दी।
बाद में उन्होंने दिल्ली के AFS Bal Bharti में शिक्षक की नौकरी की। इसके बाद वह अपने बेटे की पढ़ाई जारी रखते हुए पंजाब सरकार की PCS नौकरी के लिए चंडीगढ़ चली गईं।
युद्ध के नायक के पीछे थे एक समर्पित परिवार वाले इंसान
अजय आहूजा सिर्फ एक बहादुर वायुसेना अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक समर्पित पति और पिता भी थे।
अलका के मुताबिक, अजय हर रविवार अपने बेटे को चिड़ियाघर ले जाते थे। उन्हें खाना बनाना भी पसंद था और वह परिवार व दोस्तों के लिए पुलाव और डोसा बनाया करते थे। वह अलका और बेटे के साथ बैडमिंटन भी खेलते थे।
अलका ने कहा कि अजय जीवन के हर पल का आनंद लेते थे और परिवार के लिए समय निकालते थे।
अजय आहूजा ने 1985 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी से स्नातक होने के बाद भारतीय वायुसेना ज्वाइन की थी। अपने करियर के दौरान उन्होंने MiG-21 और MiG-23 विमान उड़ाए और फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर के रूप में भी सेवा दी।
कारगिल युद्ध के दौरान वह नंबर 17 स्क्वाड्रन ‘गोल्डन एरोज’ के फ्लाइट कमांडर थे।
अब उनकी कहानी ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ सीरीज के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंच रही है। सीरीज में सिद्धार्थ ने स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की भूमिका निभाई है, जबकि जिमी शेरगिल ने पूर्व एयर चीफ मार्शल बी.एस. धनोआ से प्रेरित किरदार निभाया है। अलका आहूजा की भूमिका अमृता बागची ने निभाई है।
Follow @Dailybiharliveआप भी अपने गांव की समस्या घटना से जुड़ी खबरें हमें 7870192482 पर भेज सकते हैं...

