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PATNA (Madras High Court's Major Ruling: Private Schools Must Publicly Display Fee Structure, Says Parents Shouldn't Have Their Pockets Burned for Their Children's Education) :

तमिलनाडु के निजी स्कूलों में दाखिले की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से मद्रास हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य के सभी मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे अपनी स्वीकृत फीस संरचना (फीस स्ट्रक्चर) स्कूल के प्रवेश द्वार, नोटिस बोर्ड और आधिकारिक वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करें। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता को अपने बच्चों का स्कूल चुनने से पहले फीस की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए, ताकि वे अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार सही निर्णय ले सकें।

यह फैसला न्यायमूर्ति एम. धनदापानी की एकल पीठ ने ऑल इंडिया प्राइवेट एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें निजी स्कूलों को फीस संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी स्कूल सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत "सार्वजनिक प्राधिकरण" नहीं माने जाते। इसलिए उनसे आरटीआई के तहत जानकारी नहीं मांगी जा सकती। हालांकि, अदालत ने कहा कि तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स (रेगुलेशन) नियम, 2023 के तहत फीस का विवरण सार्वजनिक करना उनकी कानूनी जिम्मेदारी है और इससे वे बच नहीं सकते।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए माता-पिता अक्सर अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने को तैयार रहते हैं। ऐसे में उन्हें पहले से यह जानकारी मिलनी चाहिए कि संबंधित स्कूल में कितनी फीस देनी होगी। इससे परिवार अपने बजट के अनुसार फैसला ले सकेगा और बच्चों की शिक्षा का खर्च उनकी जेब पर अनावश्यक बोझ नहीं बनेगा।

यह पूरा मामला अक्टूबर 2022 में दायर एक आरटीआई आवेदन से शुरू हुआ था। आवेदन में कोयंबटूर के मुख्य शिक्षा अधिकारी से निजी मैट्रिकुलेशन और उच्च माध्यमिक स्कूलों की फीस संरचना तथा सरकार द्वारा निर्धारित नियमों की जानकारी मांगी गई थी। लेकिन संबंधित अधिकारियों ने सीधे जानकारी देने के बजाय आवेदन को जिला शिक्षा अधिकारी और फिर 100 से अधिक निजी स्कूलों के प्राचार्यों को भेज दिया। निर्धारित 30 दिनों की अवधि के भीतर आवेदक को कोई जवाब नहीं मिला।

इसके बाद मामला तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग पहुंचा। आयोग ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और राज्य के निजी, सहायता प्राप्त तथा सीबीएसई स्कूलों को फीस संरचना नोटिस बोर्ड, वेबसाइट और प्रवेश फॉर्म में प्रदर्शित करने का निर्देश दिया।

निजी स्कूलों के संगठन ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि निजी संस्थान आरटीआई अधिनियम के दायरे में नहीं आते, इसलिए सूचना आयोग को ऐसे निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है।

सुनवाई के दौरान निजी स्कूलों के निदेशक ने अदालत को बताया कि फीस निर्धारण समिति द्वारा तय की गई सभी स्कूलों की स्वीकृत फीस पहले से ही समिति की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है। साथ ही किसी भी निजी स्कूल को निर्धारित फीस से अधिक राशि वसूलने की अनुमति नहीं है।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मद्रास हाईकोर्ट ने सूचना आयोग द्वारा अधिकारियों पर लगाया गया 25 हजार रुपये का जुर्माना रद्द कर दिया। हालांकि अदालत ने निजी स्कूलों को फीस सार्वजनिक करने के निर्देश को बरकरार रखते हुए निजी स्कूलों के निदेशक को आदेश दिया कि सभी मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में प्रवेश द्वार और नोटिस बोर्ड पर स्वीकृत फीस संरचना प्रदर्शित कराई जाए तथा इसकी अनुपालन रिपोर्ट भी प्रस्तुत की जाए।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश याचिकाकर्ता संगठन से जुड़े स्कूलों के साथ-साथ तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स एक्ट के तहत मान्यता प्राप्त सभी निजी स्कूलों पर समान रूप से लागू होगा। इस फैसले को अभिभावकों के हित में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जिससे स्कूलों की फीस व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी और दाखिले के समय भ्रम की स्थिति कम होगी।


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