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नई दिल्ली/दरभंगा। कहा जाता है कि एक अच्छा शिक्षक जीवन बदल सकता है, लेकिन जब पिता ही शिक्षक बन जाए तो सफलता की नई मिसाल कायम हो जाती है। दिल्ली के रोहिणी में रहने वाले शिक्षक कैलाश चौधरी ने इसी कहावत को सच साबित किया है। उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को बिना किसी महंगी कोचिंग पर निर्भर हुए खुद पढ़ाया और उन्हें मेडिकल की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक नीट (NEET) में सफल बनाकर डॉक्टर बनने की राह पर पहुंचा दिया।

मूल रूप से बिहार के दरभंगा जिले के रहने वाले कैलाश चौधरी पेशे से 11वीं और 12वीं के शिक्षक हैं। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी प्रज्ञा चौधरी और छोटी बेटी अंबिका चौधरी की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी खुद संभाली। फिजिक्स और केमिस्ट्री जैसे कठिन विषयों की तैयारी उन्होंने स्वयं कराई, जबकि बड़ी बहन प्रज्ञा ने छोटी बहन अंबिका को बायोलॉजी पढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।



बड़ी बेटी प्रज्ञा ने वर्ष 2024 की नीट परीक्षा में 668 अंक हासिल किए और लगभग 13 हजारवीं रैंक प्राप्त की। इसके बाद उन्हें बिहार के नालंदा स्थित भगवान महावीर आयुर्विज्ञान संस्थान, पावापुरी में एमबीबीएस में दाखिला मिला। वहीं, छोटी बेटी अंबिका ने 2026 में 576 अंक हासिल कर री-नीट परीक्षा में सफलता प्राप्त की और मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का सपना साकार किया।

इस सफलता की सबसे खास बात यह है कि दोनों बहनों ने महंगी कोचिंग के बजाय घर पर ही तैयारी की। अंबिका ने बताया कि उन्होंने रोजाना आठ घंटे से अधिक पढ़ाई की। पिता ने फिजिक्स और केमिस्ट्री की मजबूत नींव तैयार की, जबकि बड़ी बहन ने बायोलॉजी में हर कदम पर मार्गदर्शन दिया।

कैलाश चौधरी ने पढ़ाई की ऐसी रणनीति बनाई कि बेटियां हमेशा अपनी कक्षा से आगे चलती रहीं। उन्होंने प्रज्ञा को नौवीं कक्षा में ही ग्यारहवीं का पाठ्यक्रम और ग्यारहवीं में बारहवीं की तैयारी करवा दी थी। इसी मजबूत आधार का परिणाम रहा कि प्रज्ञा ने 12वीं बोर्ड परीक्षा में विज्ञान विषय में 100 में 100 अंक हासिल किए और बाद में नीट में भी शानदार प्रदर्शन किया।

इस सफलता के पीछे पिता का संघर्ष भी प्रेरणा का बड़ा स्रोत रहा। अंबिका ने बताया कि उनके पिता ने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ट्यूशन पढ़ाकर अपनी फीस का इंतजाम किया था। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को कभी नहीं छोड़ा और वही संघर्ष आज उनकी बेटियों की सफलता की नींव बना।



इस उपलब्धि का एक सामाजिक पहलू भी है। कैलाश चौधरी का पैतृक गांव दरभंगा में है, जबकि उनकी पत्नी का मायका मधेपुरा जिले में है। परिवार के अनुसार, दोनों गांवों में आज तक कोई महिला डॉक्टर नहीं बनी थी। ऐसे में प्रज्ञा और अंबिका अपने ददिहाल और ननिहाल की पहली महिला डॉक्टर बनने जा रही हैं। उनकी इस सफलता से दोनों गांवों में खुशी का माहौल है और लोग इसे बेटियों की शिक्षा की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण मान रहे हैं।

प्रज्ञा का कहना है कि बिहार में अब बेटियों की शिक्षा और करियर को लेकर समाज की सोच तेजी से बदल रही है। लोग बेटियों की उपलब्धियों पर गर्व कर रहे हैं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी कर रहे हैं। कैलाश चौधरी और उनकी बेटियों की यह कहानी इस बात का संदेश देती है कि मजबूत संकल्प, सही मार्गदर्शन और परिवार का सहयोग हो तो बिना महंगी कोचिंग के भी बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं।


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