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नई दिल्ली/प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाल विवाह और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कानूनों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत में विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है। अदालत ने कहा कि किसी भी धर्म का व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 जैसे वैधानिक कानूनों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।


यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने 1 जुलाई को बुलंदशहर में दर्ज एक प्राथमिकी (एफआईआर) को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए की। यह याचिका रूबी सहित 19 लोगों की ओर से दायर की गई थी।


मामले के अनुसार, आरोप है कि 16 वर्षीय मुस्लिम किशोरी का विवाह कराए जाने की सूचना मिलने पर पुलिस और बाल सहायता दल मौके पर पहुंचा था। इस दौरान आरोपितों ने सरकारी टीम का विरोध किया, सरकारी कार्य में बाधा डाली और किशोरी को वहां से ले जाने का प्रयास किया। इसी मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसे निरस्त कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था।


याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार यौवन प्राप्त करने के बाद, जिसे सामान्यतः 15 वर्ष की आयु माना जाता है, लड़की विवाह के लिए सक्षम हो जाती है। उनका यह भी तर्क था कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम मुस्लिम समुदाय के व्यक्तिगत कानून को प्रभावित नहीं करता।


हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों का विवाह वैध माना जाता है, तो इससे POCSO अधिनियम के प्रावधानों का प्रत्यक्ष उल्लंघन होगा, क्योंकि विवाह के बाद बनने वाले शारीरिक संबंध कानून की दृष्टि में अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों से जुड़े कानून सार्वजनिक नीति और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हैं, इसलिए इनके सामने किसी भी व्यक्तिगत कानून का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।


खंडपीठ ने यह भी कहा कि इस विषय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं, लेकिन वह केरल हाईकोर्ट की उस व्याख्या से सहमत है जिसमें कहा गया है कि कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह रोकने वाले वैधानिक कानूनों से ऊपर नहीं हो सकता।


अदालत ने पुलिस और बाल सहायता दल की कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने समय रहते हस्तक्षेप कर संभावित अपराध को रोकने का प्रयास किया। साथ ही, अदालत ने माना कि सरकारी कर्मचारियों के कार्य में बाधा डालने सहित अन्य गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। इसी आधार पर एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए जांच जारी रखने का निर्देश दिया गया।


फैसले पर विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने कहा कि सभी मुसलमानों को देश के कानून का पालन करना चाहिए। वहीं, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक जाकिया सोमन ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सामाजिक शोध केंद्र की निदेशक रंजना कुमारी ने भी फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी संरक्षण सुनिश्चित होना चाहिए।


यह फैसला स्पष्ट संकेत देता है कि बच्चों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा से जुड़े मामलों में भारतीय संविधान और संसद द्वारा बनाए गए कानून सर्वोपरि हैं तथा किसी भी व्यक्तिगत कानून या धार्मिक परंपरा के आधार पर उनका उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता।


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