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आज 30 अगस्त है… और हिंदी सिनेमा के उन महान गीतकारों में से एक शैलेंद्र की जयंती है, जिनके गीत सिर्फ सुने नहीं जाते… बल्कि जिंदगी में महसूस किए जाते हैं।

शैलेंद्र ने हिंदी फिल्म संगीत को ऐसे गीत दिए, जिनमें प्रेम भी था, दर्द भी था, संघर्ष भी था और जिंदगी का दर्शन भी।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस शख्स के लिखे गीतों ने राज कपूर की फिल्मों को अमर बना दिया, वह कभी फिल्मों के लिए गीत लिखना ही नहीं चाहता था?

कहानी शुरू होती है आजादी से पहले के भारत से।

शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को हुआ था। उनका शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा रहा। वह रेलवे की वर्कशॉप में काम करते थे और मजदूरों के बीच रहकर उन्होंने समाज को बहुत करीब से देखा।

उनके भीतर का कवि सिर्फ प्रेम और प्रकृति की बातें नहीं करता था। वह शोषण, गरीबी, आजादी और आम आदमी की जिंदगी पर भी लिखता था।

आजादी की लड़ाई के दौर में उनके गीतों में क्रांति की आवाज सुनाई देती थी।

वह लिखते थे—

“तू जिंदा है, तो जिंदगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है तो स्वर्ग को उतार ला जमीन पर।”

यही तेवर उन्हें दूसरे गीतकारों से अलग बनाता था।

एक कवि सम्मेलन में उनकी मुलाकात युवा राज कपूर से हुई। राज कपूर उस समय अपनी फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने शैलेंद्र से फिल्म के लिए गीत लिखने का आग्रह किया।

लेकिन शैलेंद्र ने साफ मना कर दिया।

उनका कहना था कि वह पैसे के लिए नहीं लिखते और सिनेमा उन्हें प्रेरित नहीं करता।

राज कपूर लौट गए… लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

कुछ समय बाद परिस्थितियां बदलीं। शैलेंद्र के परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं और उन्हें पैसों की जरूरत पड़ी।

वह राज कपूर के पास पहुंचे और कहा कि उन्हें तत्काल 500 रुपये चाहिए। बदले में वह उनके लिए गीत लिख सकते हैं।

राज कपूर ने पैसे दे दिए।

और यहीं से हिंदी सिनेमा को उसका एक महान गीतकार मिलने वाला था।

शैलेंद्र ने राज कपूर की फिल्म “बरसात” के लिए गीत लिखे।

“बरसात में हमसे मिले तुम सजन,
तुमसे मिले हम बरसात में…”

गीत लोकप्रिय हुआ और शैलेंद्र की फिल्मी दुनिया में शुरुआत हो गई।

इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत लिखे।

लेकिन उनकी खासियत यह थी कि फिल्मों में आने के बाद भी उन्होंने आम आदमी से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा।

उनके गीतों में जिंदगी का दर्शन था।

“सजन रे झूठ मत बोलो,
खुदा के पास जाना है…”

कुछ पंक्तियों में ही वह इंसान को उसकी औकात और जिंदगी की सच्चाई याद दिला देते हैं।

और फिर आया वह गीत, जिसे राज कपूर ने शुरुआत में ज्यादा महत्व नहीं दिया था।

“आवारा हूं…”

लेकिन बाद में यही गीत राज कपूर की पहचान का हिस्सा बन गया और भारत से लेकर दुनिया के कई हिस्सों तक लोकप्रिय हुआ।

शैलेंद्र सिर्फ गीतकार नहीं थे। वह एक संवेदनशील इंसान भी थे।

उनके गीतों में प्रेम था तो मजदूर का दर्द भी था। सपने थे तो संघर्ष की हकीकत भी थी।

वह लिखते थे—

“हर जोर-जुल्म की टक्कर में,
हड़ताल हमारा नारा है।”

यानी एक तरफ वह रोमांटिक गीत लिख सकते थे, तो दूसरी तरफ समाज की व्यवस्था पर सवाल भी उठा सकते थे।

यही वजह है कि उनके गीत आज भी पुराने नहीं लगते।

शैलेंद्र ने हिंदी के साथ भोजपुरी सिनेमा के लिए भी लिखा। उनकी सबसे महत्वाकांक्षी फिल्मों में “तीसरी कसम” का नाम आता है।

फिल्म को बनाने में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन यह फिल्म आज भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में गिनी जाती है।

शैलेंद्र का जीवन बहुत लंबा नहीं रहा।

1966 में महज 43 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

लेकिन जाने से पहले वह हिंदी सिनेमा को सैकड़ों ऐसे गीत दे चुके थे, जो आज भी लोगों की जिंदगी का हिस्सा हैं।

उनके गीतों में कभी प्रेमी की आवाज सुनाई देती है…

कभी मजदूर की…

कभी अकेले इंसान की…

और कभी उस आम आदमी की, जो तमाम मुश्किलों के बावजूद जिंदगी से हारना नहीं चाहता।

अपने आखिरी दौर में उन्होंने लिखा—

“रुलाके गया सपना मेरा,
बैठी हूं कब हो सबेरा…”

शायद उन्हें पता था कि जिंदगी के कुछ सपने अधूरे रह जाते हैं।

लेकिन एक कलाकार की असली जिंदगी उसके जाने के बाद शुरू होती है।

शैलेंद्र आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत आज भी हमारे बीच हैं।

जब कोई “आवारा हूं” गाता है, जब “सजन रे झूठ मत बोलो” जिंदगी की सच्चाई याद दिलाता है, जब “तू जिंदा है” संघर्ष के बीच उम्मीद जगाता है…

तब शैलेंद्र फिर हमारे बीच लौट आते हैं।

यही किसी महान कलाकार की सबसे बड़ी जीत होती है।

शैलेंद्र की जयंती पर उन्हें याद करने का सबसे खूबसूरत तरीका शायद यही है कि उनके गीत सिर्फ सुने न जाएं…

बल्कि उनके शब्दों में छिपी जिंदगी को समझा जाए।

महान गीतकार शैलेंद्र को उनकी जयंती पर शत-शत नमन।

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