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बिहटा। देश की रक्षा करते हुए कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले बिहार के वीर सपूत शहीद गणेश यादव की शहादत को 27 वर्ष पूरे हो चुके हैं। हर साल कारगिल विजय दिवस के मौके पर देश शहीदों को नमन करता है, लेकिन राजधानी पटना से सटे बिहटा के पांडेयचक गांव की तस्वीर आज भी कई सवाल खड़े करती है।

शहीद गणेश यादव के बलिदान के बाद उनके परिवार और गांव के विकास को लेकर सरकार की ओर से कई घोषणाएं की गई थीं। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि समय बीतने के साथ इनमें से कई वादे अब भी अधूरे हैं। शहीद का गांव आज भी सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।



घोषणाएं हुईं, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग

स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, शहीद के सम्मान और गांव के विकास के लिए करीब 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता, गैस एजेंसी, प्राथमिक विद्यालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक भवन और गांव तक पक्की सड़क जैसी घोषणाएं की गई थीं। पटना में पक्का मकान और पूरे गांव को बिजली उपलब्ध कराने का भी वादा किया गया था।



लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि इनमें से कई योजनाएं या तो पूरी नहीं हुईं या फिर उनका लाभ अपेक्षा के मुताबिक नहीं मिल सका।

आज भी गांव के लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में डॉक्टर और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण नहीं होने के कारण लोगों को इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।

स्कूल है, लेकिन शिक्षक नहीं

शिक्षा की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। गांव में प्राथमिक विद्यालय का एक कमरा तैयार कर दिया गया है, लेकिन शिक्षक की नियुक्ति नहीं होने के कारण छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ने के लिए करीब दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।



इसी तरह सामुदायिक भवन के निर्माण के लिए राशि स्वीकृत होने के बावजूद काम शुरू होने से पहले ही योजना विवादों में फंस गई।

शहीद के माता-पिता की उम्मीदें अब भी कायम

शहीद गणेश यादव के माता-पिता आज भी अपने बेटे की शहादत को गर्व के साथ याद करते हैं। लेकिन गांव की मौजूदा स्थिति उनके लिए पीड़ा का कारण भी है।

ग्रामीणों और शहीद के परिजनों की मांग है कि सरकार शहीद के सम्मान में किए गए सभी वादों को जल्द पूरा करे। साथ ही शहीद की मां देवी और पिता रामदेव प्रसाद की पेंशन तत्काल बहाल किए जाने की मांग भी उठाई गई है।



कारगिल विजय दिवस केवल शहीदों को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह सवाल पूछने का भी दिन है कि जिन परिवारों और गांवों ने देश के लिए अपना बेटा दिया, क्या उनके हिस्से की जिम्मेदारी भी पूरी हुई?

शहीद गणेश यादव की शहादत को 27 साल बीत चुके हैं। अब जरूरत सिर्फ श्रद्धांजलि देने की नहीं, बल्कि उनके गांव से किए गए वादों को जमीन पर उतारने की है।

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